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Loa隐藏的面孔 - 来了्षण के नियम का छुपा हुआ चेहरा

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      पिछले कुछ समय से आकर्षण का नियम अथवा आकर्षण का सिद्धांत काफी प्रसिद्धि बटोर रहा है | आकर्षण का नियम या फिर law ऑफ़ अट्रैक्शन तब सुर्ख़ियों में आया जब रोंदा ब्य्रेना नामक लेखिका की लिखी किताब और मूवी "十ीक्रेट " नाम से बाज़ार में आई | आप जान  कर हैरान रह जायेंगे की इस बुक में आपको सिर्फ सिमित जानकारी दी गयी है | निश्चित तौर पर इसमें दिए गये उपायों को आजमा कर  आप काफी कुछ पा सकते है पर क्या आप यह जानते है कि यह ब्रह्माण्ड का अकेला नियम नहीं है  |इसके साथ ही ११ नियम और है जो आपके निर्णय को और आपकी किस्मत को और आपके जीवन को कण्ट्रोल करते है | आइये जानते है आकर्षण के नियम की कुछ अनोखी बाते आकर्षण का नियम अथवा आकर्षण का सिद्धांत  हमेशा कार्य करता है , यानी की हर वो चीज जिसकी आपने दिल से ख्वाहिश करी है आकर्षण के नियम के अनुसार आपको दे दी जाएगी | यंहा तक की अगर इस जन्म में आपकी कोई ख्वाहिश पूरी नहीं हो पायी तो वो आपके आने वाले जन्म में पूरी हो जाएगी | और यदि आपने अपनी इक्छाओ या चाहतो  पर नियंत्रण करना ना सीखा तो  यही आकर्षण का नियम आपके अनंत जन्मो का कारण और अ

कौन है आपके इष्ट ?

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तो  सबसे पहले अपना एक इष्ट निश्चित कर लेना चाहिए- हर आदमी का अपना एक इष्ट होता है-होना चाहिए। इष्ट उसे कहते हैं कि जो नाना प्रकार के अनिष्टों को, दिक्कतों को, हर प्रकार के हमारे कष्टों को आपत्तियों को नष्ट करने में सर्मथ होता है। उसको इष्ट कहते हैं। वह तुम्हारा पूज्य होगा, तुम्हारा देवता होगा और उसके प्रति तुम्हारी अधिकतम श्रद्धा होनी चाहिए। यह अब आप निश्चित कर सकते हैं कि आप की श्रद्धा सबसे अधिक किसमें है उनमें राम, शिव, हनुमान, देवी, देवता, माता, पिता अथवा गुरु कोई भी हो सकते हैं या फिर स्वयं में  । यह आपको खुद निश्चित करना पडे़गा। जिसमें सबसे ज्यादा श्रद्धा और प्रेम हो, जिसे आप सबसे ज्यादा मानते हों वही आपका इष्ट है। तो जो नन्हा सा प्रेमी साधक है उसका सबसे पहला कर्तव्य है कि वो अपना इष्ट निश्चित करे, और अपनी उस नन्ही सी श्रद्धा को इधर-उधर के अन्य देवी देवता ,  अंधविश्वास और अधूरी मान्यताओं में समर्पित न करे। आप जितना भी श्रद्धा रूपी,प्रेम रूपी अपना भक्तिभाव ईश्वर को दान करना चाहते हैं,वह अपने इष्ट को दान करिये। ढूंढें इष्ट का एक अथवा ढाई अक्षर का एक नाम(आपका इष्ट मंत्र

ध्यान के शुरुवाती कदम

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शुरुवात में एकान्त में बैठकर ध्यान और भजन  करना चाहिए। जो अनुकूल पड़े वह आसन लगाइए। हां, तो कोई भी आसन हो, तुम्हें आपको  बैठने से कमर में दर्द आ गया, या और कहीं दर्द हो गया, या अभ्यास नहीं है- तो उसको बदल दिया जा सकता है। फिर शुरू करो। लेटकर करो-अगर पड़े-पड़े नींद आ जाती है- खड़े-खड़े करो। अगर ऐसे नहीं आता है, तो चलते-चलते करो। करना है, इसमें कोई दिक्कत नहीं। आसन बदला जा सकता है। और यह हम पहले कह चुके हैं, कि साधन अबाधित होना चाहिए। ऐसा नहीं कि हम बैठ जायं, तब तो हमारा ध्यान लग जाय, और जब खड़े हो जायं तो लगे ही नहीं।   तब तो फिर माया ने अच्छा न हमसे पीठ फेरी? जब हम ध्यान करेंगे, तब तो भगवान हमारे पास रहेंगे, हमको बचा लेंगे। और जब खड़े हैं-चलते हैं, खाते हैं और ध्यान नहीं है, तो फिर उस समय तो भगवान रहेंगे नहीं। भगवान नहीं रहेंगे, तो माया आ जायगी। जब भगवान नहीं रहेंगे, तो (हमारे मन में) माया अधिकार कर लेगी। तो ऐसे कैसे काम चलेगा? इसलिये हम बैठे रहें, तो भगवान को लिये रहें। खड़े रहें तो भी, भगवान को लिये रहें। सो जायं तो भी, भगवान ही बैठा रहे अंदर। हम कभी जगह न दें, अन्य को।अगर जगह दे

ध्याता और ध्येय के मिलन से ध्यान घटता है - 当灵魂和最高的灵魂相遇时,发生了冥想

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                ध्यान  चाहे 10 घण्टे करो, 24 घण्टे करो, 1 मिनट करो लेकिन उसमें मन को निशाने पर पहुंचना चाहिये। जो सबसे महान है, सबसे परे है, उसमें मन को टच होना चाहिये। अगर उससे मन टच होता है, तो साँसे   खड़ी हो जायेगी और साँसों के  खड़ी हो जाने पर(मन के ध्यान में रुकने  पर ), पीछे के  संस्कार (बुरी आदतें , बुरी यांदें , पाप कर्म , बुरे ग्रहों की स्थिति ) जल जाएंगें , तो आप मुक्त  मुक्त हो गये। फिर बोलो, हंसो, खेलो, कूदो, मस्ती काटो, ऐसा सिद्धान्त है , मतलब हर समय ह्रदय में शान्ति और आनंद की स्थिति होगी ।  लेकिन बताने से, यह होता नहीं है। करने से होता है -- करने वाले की रहनी कुछ ऐसी  हो जा ती है कि वह खाता है लेकिन खाने के संस्कार नहीं बनते। सुनता है लेकिन सुनने के संस्कार नहीं बनते। ध्यान की परमावस्था में विपरीत परिस्थियां भी अनुकूल लगेंगी आपके favour में लगेंगी , और इससे पहले की प्रतिकूल परिस्थितियाँ आपको डिस्टर्ब करें वे आपके अनुकूल हो जायेंगी | जीवन ठीक वैसा हो जायेगा जैसा के सामान्य परिस्थियों में एक बच्चे का होता  है | सरल जीवन हो जायेगा | ना अतीत की कडवी यादें सताएंगी न भविष

कौन है गुरु? - 谁是精神硕士?

गुरु कौन  है ? वो जिसमें ईश्वर प्रकट हो जाएँ | कब मिलेंगे गुरु ? जब  साधना में आप प्रारंभिक स्तर पार कर  जाएँ | कौन  मिलवायेगा गुरु से? भगवान्  जब आपमें योग्यता देख लेंगे , तो वो ही गुरु से मिलाने के सारे अरेंजमेंट कर देंगे कैसे जाने के फलां ही हमारे गुरु है ? मन शांत हो जायेगा गुरु के सामने होने से , भले ही वो आपसे  १०-१२ ft दूर ही क्यों ना हो अगर आप गुरु की वन्दना मन ही मन करोगे तो भले ही आपके गुरु किसी से भी क्यों ना बात कर रहे हो , आप पर दृष्टि जरूर डालेंगे | आप चाहे तो बार बार ऐसा करके देख सकते है परिस्थितियाँ ही ऐसी बनेगी  की आप और आपके गुरु आमने सामने आ जायेंगे | और जब वो आयेंगे आपका मन ठहराव महसूस करेगा | कहाँ खोजे ? कंही ना खोजिये | सिर्फ मानसिक पूजा कीजिये ईश्वर की , योग्यता आने पर भगवान् खुद ही ढूंढ के देंगे आपके योग्य गुरु .तब तक के लिए ईश्वर   की मानसिक तस्वीर ही आपकी गुरु है | कहाँ  पायें  ? जब ईश्वर ही आपके गुरु है तो भीतर पायें अपने भीतर... सर्वप्रथम भीतर ईश्वर को अपना गुरु मान पूजते रहें | जब साधना की प्रारंभिक कक्षा पार कर लेंगे तो वो ईश्वर किस जीव अ

ध्यान की प्रक्रिया और गुरु की पूजा - 冥想和对大师的奉献方法

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ध्येय - वह जिसका हम ध्यान करते हैं।   ध्याता वह है, जो हर समय ध्येय को धारण करता चले यानि हम लोग  । खाते-खाते, पीते-पीते, हंसते-हंसते, रोते-रोते हर समय, जो ध्येय को धारण किये रहे। यह तो नशा है। अगर नशा हो गया, तो बस फिर। उसे लोग कहते हैं कि पागल है। हां, तो वह कहेगा कि मैं पागल हूँ। पागल, पा गया और गल गया। तो जब ऐसा हो गया, तो वह जहां  जायेगा, वहां उसे वही दिखाई पडे़गा। यही ध्यान है। अब तुम जब ध्यान करने बैठते हो, तो मन इधर-उधर भागता है। अनेक तरह की बातें आती हैं। जो सही ध्यान करने वाले साधक हैं, उनके सामने भी यह बातें आती हैं। इसका कुछ कारण होता है। असल में तुम्हारे रूप को लेकर, किसी की ओर से, कोई विचार वातावरण में आ गया, अथवा तुम्हारे अपने ही पूर्व में किये हुए संकल्प, आकाश में मौजूद रहते हैं, जो ध्यान के समय तुम्हारी फ्रिक्वेन्शी (तरंगगति) में आ जायेंगे। इससे दिक्कत आ सकती है। दूसरे अगर तुम्हारा सुरा-संगम  अर्थात साँसों में मंत्र अथवा भजन ढला नही है तो भी  सही नहीं है, तो भी ठीक ध्यान नहीं जमता। हमारा लक्ष्य सही नहीं होगा, तो इसे ध्यान नहीं माना जायेगा। यह जो साँस चलती है, यह ऐसे

你的े एहसासों की ताकत

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मान लीजिए आपके अंदर ऐसी कुशलता क्या योग्यता आ जाती है कि आप सामने वाले व्यक्ति के मन में उठ रहे भावों को पहचान सकें, एहसासों को पहचान सकें, तब आप वह व्यक्ति अच्छा है या बुरा इस बात का आंकलन कैसे करेंगे ? निश्चित ही आप इस बात से उसका चरित्र नहीं देखेंगे    कि उसके अंदर कौन सी भावनाएं चल रही हैं | बल्कि यह ध्यान देंगे कि वह किन भावनाओं को चुन कर उसके according निर्णय लेगा | आप इसके द्वारा यह निश्चय करेंगे कि व्यक्ति अच्छा है या बुरा | अगर उसके अंदर चल रहे ,अच्छे और बुरे विचारों में से वह    अच्छे विचारों द्वारा जीवन ,घटना, परिस्थितियों में निर्णय ले रहा है तो आप उसे निश्चित ही अच्छा व्यक्ति मानेंगे और उसकी यदि सहायता भी करनी पड़ी तो आप करेंगे | इसी तरह अगर वो अच्छी भावनाओ के आधार पर विचार ना करके बुरी भावनाओ के    आधार पर विचार करके अपने निर्णय लेता है ,तो आप उससे बुरा व्यक्ति मानेंगे |                            इसी प्रकार आध्यात्मिक संसार में भी दैवीय   शक्तियां किसी व्यक्ति के मन में उठ रहे भाव पर लिए गए निर्णय पर यह निश्चित करती हैं कि वह संपर्क करने योग्य

साँसों का दैवीय संबंध

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一个王牌ा ईश्वरीय प्रेम जो हमारे संस्कार नहीं देखता | ये नही देखता की हमने कंहा कंहा कितना दान दिया है, जो ये भी नहीं ध्यान  नहीं  देता कि हमने अच्छे कर्म किये है कि बुरे ..उसे कोई फर्क नही पड़ता | उसे इससे भी फर्क नही पड़ता कि हमने कितनी बार प्रार्थना करी है | कोई व्रत किया है अथवा नही, कोई पूजा उपवास किया है के नहीं.. आइये आपका परिचय करवाते है ईश्वरीय प्रेम के एक अनोखे रूप से ....ऐसा रूप जिस पर हमारा ध्यान बहुत कम जाता है जैसा कि पिछली पोस्ट में भी बताया गया है ईश्वरीय प्रेम  हमेशा ही साथ रहता है | यंहा पर चर्चा करते है उस साधन की जिसके द्वारा यह दैवीय प्रेम हमारे अन्दर हर पल  समाहित होता  रहता  है | बात करते है साँसों की ....  नहीं ! यहां इड़ा पिंगला और सुषुम्ना की बात नहीं होने वाली  |   बात होने वाली है और भी आसान.... बात होने वाली है हमारी साधारण सी सांसो की... ब्रह्मांड की शक्ति को हम कई तरीके से ग्रहण करते हैं जैसे कि नींद की अवस्था में , ध्यान की अवस्था में, पूजा पाठ की अवस्था में, और योग करने पर ...लेकिन इन सब में सांसों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है

साँसे और आध्यात्मिकता(呼吸力量管理)第2部分

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ऊर्जा को अधिक से अधिक ग्रहण करने के लिए साँसों के साधन को किस तरह उपयोग में  लाया जा सकता है ? यह जानना आसान है और इसके प्रयोग भी आसान है | बस आपको दो चीजों का विशेष ध्यान रखना है –  १- आराम से करना है ..कोई जल्दबाजी कोई हड़बड़ी नहीं करनी |  एकदम नेचुरल तरीके से करना है |  २- आँखे बंद करके थोड़े समय के लिए ही करना है .. 2 min.   से 10   min.   के लिए उससे ज्यादा नहीं |  आपको करना क्या है ? आपको बस अपनी breathing  cycle को बढ़ा देना है यानी अपनी सांसों को गहरी करना है | कैसे ??? १- अपनी सांसों पर ध्या न केंद्रित करें | जैसे ही आप ध्यान केंद्रित करेंगे यह खुद ब खुद गहरी हो ती जाएंगी | बस आप अपनी सांसों के प्रति aware हो जाए | यह आसान है | ऐसा आप कभी भी कर सकते हैं -- खाना पकाते समय , कार धोते समय , कपड़े धोते समय , नाश्ता करते समय , किसी का इंतजार करते समय.. अर्थात कोई भी कार्य करते समय आप जैसे - जैसे अपनी सांसों की प्रति अवेयर होती जाएंगे वैसे -वैसे यह और भी गहरी होती जाएंगी | २- रेचक पूरक और कुंभक के समय को थोड़ा बढ़ाने की कोशिश करें | ३- प्राणाया