ध्याता और ध्येय के मिलन से ध्यान घटता है - 当灵魂和最高的灵魂相遇时,发生了冥想

                ध्यान  चाहे 10 घण्टे करो, 24 घण्टे करो, 1 मिनट करो लेकिन उसमें मन को निशाने पर पहुंचना चाहिये। जो सबसे महान है, सबसे परे है, उसमें मन को टच होना चाहिये। अगर उससे मन टच होता है, तो साँसे   खड़ी हो जायेगी और साँसों के  खड़ी हो जाने पर(मन के ध्यान में रुकने  पर ), पीछे के  संस्कार (बुरी आदतें , बुरी यांदें , पाप कर्म , बुरे ग्रहों की स्थिति ) जल जाएंगें , तो आप मुक्त  मुक्त हो गये। फिर बोलो, हंसो, खेलो, कूदो, मस्ती काटो, ऐसा सिद्धान्त है , मतलब हर समय ह्रदय में शान्ति और आनंद की स्थिति होगी ।

 लेकिन बताने से, यह होता नहीं है। करने से होता है --
Karan.े वाले की रहनी कुछ ऐसी  हो जा ती है कि वह खाता है लेकिन खाने के संस्कार नहीं बनते। सुनता है लेकिन सुनने के संस्कार नहीं बनते। ध्यान की परमावस्था में विपरीत परिस्थियां भी अनुकूल लगेंगी आपके favour में लगेंगी , और इससे पहले की प्रतिकूल परिस्थितियाँ आपको डिस्टर्ब करें वे आपके अनुकूल हो जायेंगी | जीवन ठीक वैसा हो जायेगा जैसा के सामान्य परिस्थियों में एक बच्चे का होता  है | सरल जीवन हो जायेगा | ना अतीत की कडवी यादें सताएंगी न भविष्य की चिंता सताएंगी | जैसे एक छोटा बच्चा निश्चिन्त रहता है वैसी निश्चिन्तिता मन में आ जाएगी |
明白此事ा मुश्किल  हो सकता है , मानना तो और भी मुश्किल हो सकता है ,यकीन करने से पहले आपके अंदर ये पढ़  क्रोध का संचार भी हो सकता है संदेह हो सकता है , और मुझे बुरा भला भी कह सकते है |


 पहले लोगों की समझ में नहीं आता है। समझ में आता है तब, जब साधन में उतनी गति हो।ध्यान में गति हो | क्योंकि प्रैक्टिकल बातें हैं।只要ोशिश  नहीं करेंगे ऐसी  बातें  समझ में नहीं आतीं।现在亚当ी कोई मशीनरी वस्तु तो है नहीं  जो 24 घण्टे ध्यान  में लगा रहे। लेकिन बताया ऐसे ही जाता है। लगते-लगते जब भगवान की कृपा से मन की गति रुक जाती है। ध्याता ध्यान और ध्येय  में, एकता जहां आयी और चेतना  का प्रतिबिम्ब पड़ा, बस हो गया काम पूरा।

ध्याता मन, जो ध्यान करता है, ध्येय-जिसका ध्यान करता है, और इन दोनों का जो ज्ञान, ध्यान  है। ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान-ध्याता, ध्येय और ध्यान-यह तीनों  एक हो जाए, तो उस समय वैसे ही एकतानता की स्थिति में, साधक की बुद्धि में, अनुगत चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ जाता है, और ध्यान होता   जाता है। उस स्थिति में बुद्धि को, ऋतम्भरा प्रज्ञा कहा जाता है। ‘ऋतम्भरातत्रप्रज्ञा’।

那ें अनुगत चेतन का प्रतिबिम्ब धारण करने की क्षमता होती है। और फिर थोड़ा समय लगता है। ईश्वर का जन्म हो जाता है या इसे ऐसे कहे , भगवान्  जो आपमे हममे सबमे अदृश्य रूप से रहते है स्वयं को, एकता की स्थिति में प्रकट के देते है  लेकिन एकता ज़रूरी है। और ऐसी एकतानता हो, कि भगवान उसे कन्फर्मेशन दें  दे। परीक्षा लेकर आपको पास  कर दे। थोड़ा सा टाइम लगेगा, जब बुद्धि खड़ी हो जायेगी, तो चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ जायेगा, तो ईश्वर की पैदाइश हो जायेगी। तो इस तरीके से,  एकाग्रता की ही ज़रूरत होती है।ध्यान की जितनी भी विधियां बताई जानती है ९०% एकाग्रता बढ़ने की ही विधि है , ध्यान लगाया नही जाता ध्यान घटित होने लगता है , एकाग्र हो जाये, चाहे गुरु के चरणों में हो जाये या और उस परम आत्मा में । एकाग्र होना चाहिये। लेकिन गुरु के चरण वन्दनीय हैं। परम्परा से हमारे संस्कारों के अनुकूल हैं। इसलिए उनसे ज़्यादा लाभ होगा। और नहीं तो, तुम पत्थर में एकाग्र हो सकते हो, तो उससे भी काम हो जायेगा। लेकिन उसके लिए नए संस्कार बनाने पड़ेंगे। राम नाम क्यों जपते हैं? क्योंकि परम्परा चली आ रही है। उसके संस्कार हैं पहले से, इसलिए सरलता रहती है। गुरु के चरणों की मान्यता है। नई कोई चीज़ लेकर चलेंगे, तो उसके लिए संस्कार बनाने पड़ेंगे। बहुत सी ऊर्जा खर्च होगी। तो उसको क्या हुआ? मन एकाग्र हुआ। ध्याता, ध्येय और ध्यान में एकतानता आयी। बुद्धि में अनुगत चेतन का प्रतिबिम्ब आ गया।
 मन अपने
ध्येय में ऐसा तल्लीन हो जाये, कि अपने को उसमें विलीन कर दे।
ध्याता, ध्यान और ध्येय में एकता हो जाय,यह सही ध्यान कहा जायगा।

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